धनतेरस कार्तिक कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी को आता है, इसलिए इसे धनत्रयोदशी भी कहते हैं। इस साल त्रयोदशी 6 नवंबर को सुबह शुरू होकर 7 नवंबर की सुबह तक रहती है। यही तारीख़ को लेकर भ्रम की जड़ है।
धनतेरस की पूजा और यम दीपदान शाम को, प्रदोष काल में होते हैं। इसलिए नियम यह है कि जिस दिन प्रदोष काल में त्रयोदशी मौजूद हो, उसी दिन धनतेरस मनाई जाए। 6 नवंबर की शाम को त्रयोदशी पूरी तरह उपलब्ध है, जबकि 7 नवंबर को शाम तक यह समाप्त हो चुकी होगी। इसलिए धनतेरस 6 नवंबर, शुक्रवार को है। हमने जिन प्रमुख पंचांगों और समाचार स्रोतों को देखा, वे सब इसी तारीख़ पर एकमत हैं।

शुभ मुहूर्त (नई दिल्ली)
| क्या | समय | ध्यान रखें |
|---|---|---|
| त्रयोदशी तिथि | 6 नवंबर सुबह 10:30 से 7 नवंबर सुबह 10:47 तक | कुछ पंचांग इसे लगभग 9:30 से 11:45 तक बताते हैं |
| प्रदोष काल | शाम 5:33 से रात 8:09 तक | पूजा इसी के भीतर करें |
| पूजा का मुख्य मुहूर्त (वृषभ काल) | शाम 6:02 से 7:57 तक | स्थिर लग्न होने से सबसे उत्तम माना जाता है |
| यम दीपदान | प्रदोष काल में, पूजा के बाद | अलग से कोई सटीक मिनट तय नहीं है |
वृषभ एक स्थिर राशि है और इसका स्वामी शुक्र है, जो सुख-संपदा का कारक माना गया है। परंपरा कहती है कि स्थिर लग्न में की गई पूजा घर में टिकती है। इसी कारण धनतेरस और दिवाली की पूजा के लिए पंचांग प्रदोष काल के भीतर वृषभ काल को सबसे ऊपर रखते हैं।
अलग-अलग वेबसाइट पर अलग समय क्यों दिखता है?
यह सवाल लगभग हर पाठक के मन में आता है, इसलिए सीधा जवाब:
- शहर का फ़र्क़। सूर्यास्त और लग्न का समय अक्षांश-देशांतर पर निर्भर है। मुंबई, कोलकाता और जयपुर के समय दिल्ली से अलग होंगे। उदाहरण के लिए मुंबई में पूजा का समय लगभग 6:35 से 8:35 और कोलकाता में लगभग 5:28 से 7:26 बताया गया है।
- गणना की पद्धति। पंचांग अलग-अलग गणना-पद्धतियाँ अपनाते हैं। इसलिए त्रयोदशी की शुरुआत कहीं 9:30 बजे और कहीं 10:30 बजे मिलती है।
- शहर का नाम न लिखना। कई लेखों में यह नहीं बताया जाता कि समय किस शहर का है।
आप क्या करें: अपने शहर का पंचांग देखें और सूर्यास्त के बाद प्रदोष काल में पूजा आरंभ करें। अगर आपके स्थानीय पंडित या मंदिर का पंचांग कुछ मिनट अलग बताए, तो अपने स्थानीय पंचांग को प्राथमिकता दें।
लोग धनतेरस पर असल में क्या पूछते हैं?
- सोना किस समय ख़रीदें, और क्या सुबह ख़रीदना ठीक है?
- बजट कम हो तो क्या लें?
- झाड़ू, बर्तन और धनिया क्यों ख़रीदते हैं?
- यम का दीपक किस दिशा में, कब और कितनी बत्तियों का रखें?
- नौकरी से देर से घर लौटें तो पूजा कैसे करें?
- कुछ ग़लत ख़रीद लिया तो क्या अशुभ होगा?
आगे हर सवाल का सीधा जवाब मिलेगा।
धनतेरस का महत्व
आरोग्य पहले, धन बाद में
धनतेरस की शुरुआत धन से नहीं, स्वास्थ्य से जुड़ी है। पुराणों की परंपरा के अनुसार समुद्र मंथन में भगवान धन्वंतरि हाथ में अमृत-कलश लिए प्रकट हुए। उन्हें देवताओं का वैद्य और आयुर्वेद का प्रवर्तक माना जाता है। इसीलिए इस तिथि को धन्वंतरि त्रयोदशी या धन्वंतरि जयंती भी कहते हैं।
इसका संदेश साफ़ है: पाँच दिन के दीपोत्सव का पहला दिन आरोग्य को दिया गया है। लोक-कहावत भी यही कहती है कि पहला सुख निरोगी काया।

यम दीपदान की कथा
लोक-परंपरा में एक कथा प्रचलित है। एक राजकुमार की कुंडली में विवाह के चौथे दिन सर्पदंश से मृत्यु का योग था। उसकी पत्नी ने उस रात द्वार पर ढेर सारे दीपक जलाए, आभूषण और सिक्के सजाए, और रात भर कथा-गीत सुनाती रही। कथा के अनुसार यमराज सर्प के रूप में आए, पर उस प्रकाश और स्वर के आगे ठहर गए और लौट गए। इसी स्मृति में धनतेरस की शाम यम के नाम पर दीपक जलाया जाता है।
कथा के विवरण क्षेत्र के अनुसार थोड़े बदलते हैं। उसका भाव यही है कि घर में रोशनी और जागरूकता हो तो संकट टलता है।

लक्ष्मी और कुबेर
इस दिन लक्ष्मी और कुबेर का पूजन भी होता है। कुबेर को धन का रक्षक माना जाता है और लक्ष्मी को धन के प्रवाह की देवी। दोनों साथ इसलिए पूजे जाते हैं कि धन कमाना और उसे सँभालकर रखना, दोनों बातें ज़रूरी हैं। ध्यान रहे, लक्ष्मी पूजा का मुख्य पर्व दो दिन बाद अमावस्या को आता है। धनतेरस उसकी तैयारी का दिन है।
ज्योतिषीय दृष्टि
शुक्रवार का संयोग। इस साल धनतेरस शुक्रवार को है। शुक्रवार का स्वामी शुक्र है, जिसे ज्योतिष में धन, भोग-विलास, कला और सुख-सुविधा का कारक माना गया है। परंपरा इसे लक्ष्मी-साधना के लिए अनुकूल मानती है।
त्रयोदशी और प्रदोष। त्रयोदशी तिथि का संबंध प्रदोष व्रत और शिव-आराधना से भी है। प्रदोष काल दिन और रात के संधिकाल का वह समय है जिसे साधना और शांति के लिए उत्तम माना गया है।
कुंडली में क्या देखा जाता है। धन के सवाल पर ज्योतिषी आम तौर पर ये बिंदु देखते हैं: दूसरा भाव (संचित धन और परिवार), ग्यारहवाँ भाव (आय और लाभ), धनेश और लाभेश की स्थिति, और शुक्र व गुरु की स्थिति। इसीलिए कौन-सी धातु या कौन-सी वस्तु किसके लिए अनुकूल है, यह व्यक्ति-व्यक्ति पर निर्भर करता है। इसे एक ही नियम में नहीं बाँधा जा सकता।
धातु और ग्रह की परंपरागत मान्यता। सोना गुरु से, चाँदी चंद्र और शुक्र से, और ताँबा सूर्य और मंगल से जोड़ा जाता है। यह परंपरा है। इसे अपनी कुंडली देखकर समझना बेहतर है।
ये ज्योतिषीय संबंध आस्था और परंपरा पर आधारित हैं। इनके आधार पर किसी लाभ की गारंटी नहीं दी जा सकती।
धनतेरस पर क्या ख़रीदें और क्यों
| वस्तु | परंपरा क्या कहती है | व्यावहारिक बात |
|---|---|---|
| सोना या चाँदी (सिक्का, आभूषण) | धन और सौभाग्य का प्रतीक | हॉलमार्क, शुद्धता और पक्का बिल देखें |
| पीतल, ताँबा या स्टील का बर्तन | धन्वंतरि के अमृत-कलश का प्रतीक | घर की ज़रूरत भी पूरी होती है |
| झाड़ू | लक्ष्मी का रूप; दरिद्रता बुहारने का प्रतीक | सबसे कम ख़र्च में परंपरा निभाने का तरीक़ा |
| साबुत धनिया | समृद्धि का प्रतीक | बाद में बोया भी जा सकता है |
| गोमती चक्र या लक्ष्मी-गणेश का सिक्का | दिवाली पूजन के लिए | सीमित बजट में भी संभव |
| कोई भी नई उपयोगी वस्तु | नए आरंभ का संकेत | ज़रूरत और बजट के भीतर ही लें |
बजट कम हो तो। परंपरा का भाव "कुछ शुभ और काम की वस्तु घर लाना" है, महँगी चीज़ ख़रीदना नहीं। एक झाड़ू, पीतल का एक दीया या थोड़ा साबुत धनिया लाना भी पर्याप्त माना गया है। इस पर्व की भावना के विपरीत होगा कि कोई कर्ज़ लेकर या दबाव में आकर ख़रीदारी करे।
ख़रीदारी का समय। परंपरा के अनुसार त्रयोदशी लगने के बाद की गई ख़रीदारी शुभ मानी जाती है, यानी 6 नवंबर को दिन में लगभग 10:30 बजे के बाद (कुछ पंचांगों में थोड़ा पहले)। शुभ चौघड़िया और अभिजीत मुहूर्त में ख़रीदना और भी अच्छा माना जाता है। चौघड़िया का समय शहर के अनुसार बदलता है, इसलिए स्थानीय पंचांग से मिला लें। एक ही मुहूर्त के लिए भागदौड़ करने की ज़रूरत नहीं है।

किन बातों से बचें
- उधार या क्रेडिट कार्ड से दबाव में ख़रीदारी। त्योहार के ऑफ़र के नाम पर बढ़ा हुआ ख़र्च बाद की चिंता बन जाता है।
- बिना बिल या हॉलमार्क के गहने।
- परंपरा के अनुसार कई परिवार इस दिन नुकीली चीज़ें (चाकू, कैंची), काले रंग का सामान और काँच नहीं ख़रीदते। लोहे या एल्युमिनियम के बर्तन के बारे में भी अलग-अलग मत हैं। स्टील का चलन बहुत है।
- इस दिन किसी को उधार देने से भी कई घरों में परहेज़ किया जाता है।
ये सब लोक-मान्यताएँ हैं और क्षेत्र-क्षेत्र में बदलती हैं। इन्हें सुझाव की तरह लें, डर की तरह नहीं। अपने परिवार की परंपरा सबसे ऊपर रखें।
पूजा की सामग्री
- प्रतिमा या चित्र: धन्वंतरि, लक्ष्मी-गणेश और कुबेर (मूर्ति, चित्र या यंत्र)
- पूजन: चौकी, लाल या पीला कपड़ा, कलश, आम के पत्ते, नारियल, रोली, अक्षत, हल्दी, मौली
- अर्पण: फूल, पान, सुपारी, खील-बताशे, मिठाई, फल
- दीप: घी या तेल के दीपक, यम के लिए चौमुखा (चार बत्ती वाला) मिट्टी का दीपक
- धन-प्रतीक: आज ख़रीदा हुआ बर्तन या सिक्का, साबुत धनिया, गोमती चक्र
- शुद्धि: गंगाजल, धूप, कपूर
धन्वंतरि, लक्ष्मी और कुबेर पूजन की विधि
- स्नान और संकल्प। स्वच्छ वस्त्र पहनें। हाथ में जल और अक्षत लेकर मन में संकल्प करें कि परिवार के स्वास्थ्य और सुख-समृद्धि के लिए पूजा कर रहे हैं।
- स्थान की शुद्धि। उत्तर-पूर्व या पूर्व दिशा में पूजा-स्थल रखें। गंगाजल छिड़कें, चौकी पर कपड़ा बिछाएँ।
- स्थापना। धन्वंतरि, लक्ष्मी-गणेश और कुबेर की प्रतिमा या चित्र रखें। पास में जल भरा कलश रखें और उस पर नारियल रखें।
- गणेश पूजन। हर पूजा की तरह सबसे पहले गणेश जी का स्मरण।
- धन्वंतरि पूजन। पीले फूल, तुलसी और नैवेद्य अर्पित करें। परिवार के अच्छे स्वास्थ्य की प्रार्थना करें।
- लक्ष्मी और कुबेर पूजन। कमल या गेंदे का फूल, कुमकुम और भोग अर्पित करें। आज ख़रीदे बर्तन या सिक्के को चौकी पर रखकर तिलक करें।
- मंत्र-जप। श्रद्धा से नीचे के मंत्रों में से कोई एक पढ़ें।
- आरती और प्रसाद। धन्वंतरि और लक्ष्मी जी की आरती करें, प्रसाद बाँटें।
- दीपक। पूजा के बाद घर के मुख्य द्वार, तुलसी, आँगन और छत पर दीपक जलाएँ। 13 दीपकों की परंपरा भी कई घरों में है।
पूरी विधि में लगभग 40 से 50 मिनट लगते हैं। समय कम हो तो 15 से 20 मिनट की संक्षिप्त पूजा भी स्वीकार्य है। भाव मायने रखता है, लंबाई नहीं।
मंत्र
- धन्वंतरि: ॐ नमो भगवते वासुदेवाय धन्वंतरये अमृतकलशहस्ताय सर्वामयविनाशनाय त्रैलोक्यनाथाय श्रीमहाविष्णवे नमः। (सरल रूप: ॐ धन्वंतरये नमः)
- कुबेर: ॐ यक्षाय कुबेराय वैश्रवणाय धनधान्याधिपतये धनधान्यसमृद्धिं मे देहि दापय स्वाहा।
- लक्ष्मी: ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये प्रसीद प्रसीद ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं महालक्ष्म्यै नमः।
यम दीपदान कैसे करें
- कब: 6 नवंबर की शाम, प्रदोष काल में, पूजा के बाद।
- दीपक: मिट्टी का चौमुखा दीपक। तेल सरसों या तिल का रखा जाता है।
- कहाँ: घर के बाहर मुख्य द्वार या आँगन में, ऐसे रखें कि दीपक का मुख दक्षिण दिशा की ओर हो। दक्षिण दिशा को यम की दिशा माना गया है।
- भाव: परिवार को अकाल मृत्यु और रोग से बचाने की प्रार्थना। प्रचलित श्लोक है: "मृत्युना पाशदण्डाभ्यां कालेन श्यामया सह। त्रयोदश्यां दीपदानात् सूर्यजः प्रीयतां मम॥"
- सुरक्षा: दीपक ऐसी जगह रखें जहाँ बच्चे, पालतू जानवर और हवा से परदे न टकराएँ।
वास्तु, लाल किताब और अंक ज्योतिष
वास्तु। पूजा-स्थान ईशान कोण (उत्तर-पूर्व) में रखना शुभ माना जाता है। मुख्य द्वार स्वच्छ और रोशन रखें, और कबाड़ या टूटा सामान न रखें। तिजोरी उत्तर की ओर खुलने वाली रखने की परंपरा है, क्योंकि उत्तर दिशा कुबेर की मानी गई है।
लाल किताब परंपरा। इसमें दान और कुछ लोक-उपाय बताए जाते हैं, जैसे ज़रूरतमंद को अन्न-वस्त्र देना। इन्हें श्रद्धा और सेवा की दृष्टि से लें, किसी चमत्कार की अपेक्षा से नहीं।
अंक ज्योतिष। 6 तारीख़ का मूलांक 6 है, जिसका स्वामी शुक्र माना जाता है। शुक्रवार का स्वामी भी शुक्र ही है। यह एक रोचक प्रतीकात्मक संयोग है और इसे उसी रूप में लें।
आज के समय में धनतेरस का मतलब
स्वास्थ्य। धन्वंतरि पूजन का सबसे व्यावहारिक रूप है माता-पिता और अपना स्वास्थ्य परीक्षण करवाना: ब्लड प्रेशर, शुगर और ज़रूरी जाँचें। इसे पूजा का हिस्सा मानें।
सोना और बचत। सोना ख़रीदने से पहले अपना बजट, शुद्धता (हॉलमार्क), मेकिंग चार्ज और पक्के बिल का ध्यान रखें। सोने में निवेश के कई रूप हैं, जैसे सिक्का, आभूषण या डिजिटल विकल्प। हर रूप के अपने ख़र्च और जोखिम हैं। यह सामान्य जानकारी है, निवेश सलाह नहीं। बड़ी रक़म हो तो योग्य वित्तीय सलाहकार से पूछ लें।
कर्ज़ से सावधानी। ऑफ़र के चक्कर में EMI या क्रेडिट कार्ड पर ज़रूरत से ज़्यादा ख़र्च त्योहार की ख़ुशी को चिंता में बदल सकता है।
धोखाधड़ी। नकली गहने, फ़र्ज़ी ऑनलाइन ऑफ़र और बिना बिल की ख़रीद से सावधान रहें।
स्थानीय बाज़ार। कुम्हार, बर्तन वाले और छोटे दुकानदारों से ख़रीदारी पर्व की सामाजिक भावना को भी मज़बूत करती है।
कुछ आम स्थितियाँ (काल्पनिक, पर बहुत सामान्य)
कम बजट। एक परिवार हर साल एक नया पीतल का दीया और झाड़ू लाता है, और जो पैसा बचता है उसे आपात-बचत में रखता है। इनके लिए धनतेरस का मतलब है थोड़ा लेना और सँभालकर रखना।
देर से घर पहुँचने वाले। शाम 7:30 बजे घर लौटने वाले दंपति के पास 6:02 से 7:57 के मुहूर्त का आधा घंटा बचता है। परंपरा में पूजा का आरंभ प्रदोष काल के भीतर कर लेना पर्याप्त माना जाता है। इसलिए सामग्री पहले से सजाकर रखें और घर पहुँचते ही संकल्प लेकर शुरू कर दें।
स्वास्थ्य का संकल्प। एक परिवार धनतेरस पर बुज़ुर्गों का हेल्थ चेकअप बुक करता है। यह धन्वंतरि पूजन का आधुनिक और सबसे सार्थक रूप है।
सामान्य गलतियाँ
- यम दीपदान या पूजा 7 नवंबर को करना, जबकि प्रदोष में त्रयोदशी 6 नवंबर को है।
- धनतेरस को केवल सोना ख़रीदने का दिन मान लेना और धन्वंतरि पूजन व स्वास्थ्य को भूल जाना।
- बिना बिल और हॉलमार्क के गहने ख़रीदना।
- दबाव में कर्ज़ लेकर ख़रीदारी करना।
- दीपक को असुरक्षित जगह या खुले परदे के पास रखना।
- ख़रीदी हुई वस्तु को बिना पूजा में रखे अलमारी में रख देना।
- इंटरनेट पर मिले समय को बिना अपने शहर से मिलाए मान लेना।
विशेषज्ञ सुझाव और सावधानियाँ
- ख़रीदारी की सूची और बजट एक दिन पहले तय करें।
- सोना-चाँदी हमेशा भरोसेमंद ज्वेलर से, पक्के बिल के साथ ख़रीदें।
- पूजा से पहले पूरा परिवार साथ बैठे। एक स्वास्थ्य-संकल्प, एक बचत-संकल्प और एक दान का संकल्प लें।
- जो भी आप दान कर सकें (अन्न, वस्त्र, दीपक) ज़रूर करें।
- खुले दीपक के आसपास बच्चों और सिंथेटिक कपड़ों का ध्यान रखें।
- भीड़-भरे बाज़ार में नकदी और गहनों की सुरक्षा रखें।
- "धन-वर्षा के उपाय" बेचने वालों या डर दिखाने वालों से दूर रहें।
- गर्भवती महिलाएँ, बुज़ुर्ग और रोगी बाज़ार की लंबी भीड़ और देर रात की भागदौड़ से बचें।
पाँच दिन का दीपोत्सव 2026
| दिन | तारीख़ | पर्व |
|---|---|---|
| पहला | 6 नवंबर, शुक्रवार | धनतेरस |
| दूसरा | 7 नवंबर, शनिवार | नरक चतुर्दशी / छोटी दिवाली |
| तीसरा | 8 नवंबर, रविवार | दिवाली और लक्ष्मी पूजा |
| चौथा | 10 नवंबर, मंगलवार | गोवर्धन पूजा |
| पाँचवाँ | 11 नवंबर, बुधवार | भाई दूज |
अंतिम दो पर्वों की तिथि कुछ पंचांगों में एक दिन आगे-पीछे मिलती है। स्थानीय पंचांग देख लें।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
1. धनतेरस 2026 कब है? शुक्रवार, 6 नवंबर 2026 को।
2. धनतेरस पूजा का शुभ मुहूर्त क्या है? नई दिल्ली के लिए शाम 6:02 से 7:57 बजे। यह प्रदोष काल के भीतर वृषभ काल है। अन्य शहरों के लिए समय अलग होगा।
3. क्या 7 नवंबर को भी धनतेरस मना सकते हैं? त्रयोदशी 7 नवंबर की सुबह तक है, पर पूजा और यम दीपदान प्रदोष काल में होते हैं, जब त्रयोदशी 6 नवंबर को है। इसलिए मुख्य पूजा 6 नवंबर को ही होगी।
4. सोना कब ख़रीदें? त्रयोदशी लगने के बाद, यानी 6 नवंबर को दिन में लगभग 10:30 बजे के बाद पूरे दिन और शाम तक। शुभ चौघड़िया और अभिजीत मुहूर्त को प्राथमिकता दें, और शहर का समय स्थानीय पंचांग से देख लें।
5. यम का दीपक किस दिशा में रखें? शाम को प्रदोष काल में घर के बाहर, इस तरह कि दीपक का मुख दक्षिण दिशा की ओर रहे।
6. धनतेरस पर झाड़ू क्यों ख़रीदते हैं? झाड़ू को लक्ष्मी का रूप और दरिद्रता बुहारने का प्रतीक माना जाता है। यह परंपरा है, कोई शास्त्रीय अनिवार्यता नहीं।
7. बजट कम हो तो क्या करें? बर्तन, झाड़ू, साबुत धनिया या कोई छोटी उपयोगी वस्तु लें। पूजा का भाव ज़रूरी है, वस्तु की क़ीमत नहीं।
8. अगर मुहूर्त में पूजा न कर पाएँ? प्रदोष काल के भीतर पूजा आरंभ कर दें। फिर भी न हो सके तो उसी रात शांत मन से संक्षिप्त पूजा कर लें।
9. धन्वंतरि पूजन क्यों ज़रूरी है? धन्वंतरि आरोग्य के देवता हैं। परंपरा में स्वास्थ्य को पहला धन माना गया है।
10. क्या धनतेरस पर ख़रीदारी से धन की गारंटी मिलती है? नहीं। यह आस्था और परंपरा है। आर्थिक उन्नति के लिए आय, बचत और अनुशासन भी चाहिए।
निष्कर्ष
धनतेरस 2026 की तारीख़ याद रखें: शुक्रवार, 6 नवंबर। पूजा के लिए शाम का प्रदोष काल चुनें, जिसमें नई दिल्ली के लिए 6:02 से 7:57 बजे का वृषभ काल सबसे उत्तम है। अपने शहर का समय स्थानीय पंचांग से मिला लें।
इस पर्व का असली संदेश क्रम में छिपा है: पहले आरोग्य, फिर धन, फिर उसका सही उपयोग। जो परिवार इस दिन स्वास्थ्य, बचत और दान, तीनों का संकल्प लेता है, उसके लिए धनतेरस केवल ख़रीदारी का दिन नहीं रहता, जीवन को व्यवस्थित करने का अवसर बन जाता है।
आपको और आपके परिवार को धनतेरस की शुभकामनाएँ।
अपनी कुंडली के अनुसार कौन-सी धातु या वस्तु आपके लिए अनुकूल रहेगी, यह जानने के लिए Astroyantrik के ज्योतिषाचार्य से परामर्श कर सकते हैं।