11 अक्टूबर 2026, रविवार को, करोड़ों घरों में एक छोटा-सा मिट्टी का पात्र रखा जाएगा, उसमें जौ बोए जाएँगे, और ऊपर जल से भरा कलश। नौ दिन बाद वही जौ हरे-पीले अंकुर बनकर घर में खड़े होंगे। यही शारदीय नवरात्रि की शुरुआत है।
लेकिन इस बार एक सवाल हर घर में उठ रहा है: "कलश स्थापना कब करें?" क्योंकि पंचांग देखने पर प्रतिपदा के दिन चित्रा नक्षत्र और वैधृति योग दोनों पड़ रहे हैं, और परंपरा में इन दोनों को कलश स्थापना के लिए वर्जित कहा गया है। अलग-अलग वेबसाइटें अलग-अलग समय बता रही हैं। इस लेख में हम यही उलझन सुलझाएँगे, और फिर नौ देवियों की पूजा, भोग, व्रत और उपाय क्रम से समझेंगे।

कौन-सा नवरात्र, और शारदीय क्यों खास है
वर्ष में चार नवरात्र माने जाते हैं: चैत्र, आषाढ़ (गुप्त), आश्विन (शारदीय) और माघ (गुप्त)। इनमें चैत्र और आश्विन के नवरात्र गृहस्थों में सबसे अधिक मनाए जाते हैं। देवीभागवत महापुराण (तृतीय स्कंध) में इन दोनों ऋतु-संधियों पर देवी की उपासना का वर्णन मिलता है।
"शारदीय" का अर्थ है शरद ऋतु का। आश्विन शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से नवमी तक यह पर्व चलता है, और दशमी को विजयादशमी आती है। ऋतु बदलती है, दिन-रात का संतुलन बदलता है, शरीर और मन दोनों पर असर पड़ता है। परंपरा ने इसी समय को संयम, उपवास और साधना के लिए चुना। यह बात आज का पोषण-विज्ञान भी मानता है कि ऋतु-परिवर्तन में हल्का और सात्विक भोजन शरीर के लिए अच्छा रहता है।
शारदीय नवरात्रि 2026: तिथियाँ एक नज़र में
| घटना | तारीख / वार |
|---|---|
| घटस्थापना (प्रतिपदा) | 11 अक्टूबर 2026, रविवार (प्रतिपदा रात 9:31 तक) |
| दुर्गाष्टमी | 18 अक्टूबर सुबह 8:28 से 19 अक्टूबर सुबह 10:52 तक अष्टमी; अधिकांश पंचांग 19 अक्टूबर मानते हैं, बंगाल-पद्धति में 18 अक्टूबर |
| महानवमी | 19 अक्टूबर सुबह 10:52 से 20 अक्टूबर दोपहर 12:50 तक नवमी |
| विजयादशमी (दशहरा) | 20 अक्टूबर 2026, मंगलवार (दशमी 20 को दोपहर 12:50 से 21 को दोपहर 2:12 तक, अपराह्न-पूजन 20 को) |
(समय दिल्ली के लिए, Astroyantrik पंचांग गणना।) अष्टमी-नवमी की तारीख इसलिए अलग-अलग दिखती है कि इस बार सप्तमी दो सूर्योदयों (17 और 18 अक्टूबर) को छूती है, और अष्टमी 18 की सुबह 8:28 पर लग जाकर 19 की सुबह 10:52 तक रहती है। उदया-तिथि वाले पंचांग अष्टमी 19 को मानते हैं, मध्याह्न-व्यापिनी मानने वाले (बंगाल सहित) 18 को। यह गलती नहीं, दो पद्धतियों का फ़र्क है। अपने क्षेत्र और परंपरा का पंचांग मानें।
कलश स्थापना मुहूर्त 2026: असली उलझन
शास्त्रीय नियम सरल है: घटस्थापना प्रतिपदा तिथि में, दिन के पहले भाग में करना श्रेष्ठ है। यदि किसी कारण वह समय न मिले, तो अभिजित मुहूर्त में की जा सकती है।
इस वर्ष की अड़चन: 11 अक्टूबर को प्रतिपदा तो है, पर चित्रा नक्षत्र और वैधृति योग भी हैं। ग्रंथों के अनुसार इन दोनों में घटस्थापना निषिद्ध मानी गई है। कई पंचांग कहते हैं कि प्रतिपदा के बाकी समय में ये दोनों दिनभर व्याप्त रहते हैं, इसलिए अपवाद के रूप में दिन का अभिजित काल लेना ठीक माना जाता है।
अलग-अलग स्रोत, अलग समय (सभी 11 अक्टूबर के):
| स्रोत / गणना | घटस्थापना समय | अभिजित |
|---|---|---|
| दिल्ली के लिए कुछ पंचांग | प्रातः 06:19 – 10:12 | 11:44 – 12:31 |
| Drik Panchang (उनके शहर-सेटिंग के अनुसार) | 06:55 – 09:00 | 12:16 – 13:02 |
| Astroyantrik गणना, दिल्ली (सूर्योदय 06:19) | 06:19 – 21:31 (प्रतिपदा काल; श्रेष्ठ: दिन का पहला भाग) | 11:44 – 12:30 |
| Astroyantrik गणना, देहरादून (सूर्योदय 06:17) | 06:17 – 21:31 | 11:41 – 12:27 |
हमारी गणना में उस दिन: प्रतिपदा रात 9:31 बजे तक; चित्रा नक्षत्र रात 10:31 तक (यानी पूरी प्रतिपदा में); वैधृति योग सुबह से दोपहर लगभग 12:19 (दिल्ली) / 12:17 (देहरादून) तक। यानी वैधृति अभिजित काल के अंत से कुछ ही मिनट पहले उतरता है, और चित्रा पूरे दिन रहता है।
अंतर इसलिए है कि शहर अलग हैं और गणना-पद्धति (सूर्यसिद्धांत बनाम आधुनिक/दृक) अलग है। इसलिए किसी एक वेबसाइट का समय आँख बंद करके न मानें।
व्यावहारिक सलाह (विशेषज्ञ दृष्टि):
- जिनके कुल-पुरोहित या परिवार की परंपरा तय है, वे उसी का पालन करें। यह सबसे ऊपर है।
- जिनके पास कोई परंपरा नहीं, वे अभिजित मुहूर्त चुनें: दिल्ली में 11:44–12:30, देहरादून में 11:41–12:27, लखनऊ-पटना जैसे पूर्वी शहरों में थोड़ा पहले (अपने शहर का समय Astroyantrik पंचांग पेज पर देखें)। यही इस वर्ष चित्रा-वैधृति की वर्जना का सर्वमान्य समाधान माना जाता है।
- हमारी सिफ़ारिश: संकल्प और पूजन की तैयारी सुबह कर लें, कलश का स्थापन अभिजित की दूसरी छमाही (दिल्ली में लगभग 12:15–12:30, जब वैधृति उतर चुका हो) में करें। जिन्हें सुबह ही करना अनिवार्य है (नौकरी, यात्रा), वे अपने पुरोहित से पूछकर ही सुबह का समय लें।
- रात में घटस्थापना न करें; शास्त्रों में इसे अनुचित माना गया है, भले ही प्रतिपदा रात 9:31 तक हो।
- अकेले रहने वाले, कामकाजी लोग जो सुबह समय नहीं निकाल सकते: अभिजित में 15 मिनट का सादा स्थापन भी पर्याप्त है। देवी भाव देखती हैं, घड़ी नहीं।
नौ दिन, नौ देवियाँ
क्रम सब पंचांगों में एक है:
| दिन | तारीख | देवी | भाव / प्रिय रंग (प्रचलित) |
|---|---|---|---|
| 1 | 11 अक्टूबर, रवि | शैलपुत्री | स्थिरता, शुरुआत · पीला/लाल |
| 2 | 12 अक्टूबर, सोम | ब्रह्मचारिणी | तप, संयम · हरा/श्वेत |
| 3 | 13 अक्टूबर, मंगल | चंद्रघंटा | साहस, शांति · धूसर/नारंगी |
| 4 | 14 अक्टूबर, बुध | कूष्मांडा | ऊर्जा, आरोग्य · नारंगी/नीला |
| 5 | 15 अक्टूबर, गुरु | स्कंदमाता | मातृत्व, ज्ञान · श्वेत/पीला |
| 6 | 16 अक्टूबर, शुक्र | कात्यायनी | विवाह, शक्ति · लाल/हरा |
| 7 | 17 अक्टूबर, शनि | कालरात्रि | भय-नाश · नीला/काला-नीला |
| 8 | 18 अक्टूबर, रवि | महागौरी (अष्टमी 8:28 सुबह से) | शुद्धि, सौम्यता · गुलाबी/श्वेत |
| 9 | 19 अक्टूबर, सोम | सिद्धिदात्री (नवमी 10:52 सुबह से) | सिद्धि, पूर्णता · बैंगनी/नारंगी |
| – | 20 अक्टूबर, मंगल | विजयादशमी | विजय, पूर्णाहुति, विसर्जन |
(रंगों की सूची परंपरा-आधारित लोकप्रिय क्रम है; इसमें क्षेत्रों के बीच भिन्नता है और यह कोई शास्त्रीय अनिवार्यता नहीं।)
दिन-तारीख का मिलान: हमारी गणना में प्रतिपदा से नवमी तक कोई तिथि लुप्त नहीं होती; नौ तिथियाँ 11 से 19 अक्टूबर के नौ दिनों में क्रम से आती हैं (सप्तमी 17 के सूर्योदय से 18 की सुबह 8:28 तक, फिर अष्टमी)। इसलिए ऊपर की तालिका सबसे सीधी व्यवस्था है। जो परिवार उदया-तिथि से चलते हैं, वे महागौरी का पूजन 19 की सुबह (अष्टमी 10:52 तक) और सिद्धिदात्री का पूजन 19 की दोपहर या 20 की सुबह (नवमी दोपहर 12:50 तक) में कर सकते हैं। संधि-पूजा (अष्टमी-नवमी का संगम) 19 अक्टूबर को लगभग सुबह 10:52 के आसपास पड़ती है।
आज का पंचांग पेज: अपने शहर के लिए ठीक-ठीक समय Astroyantrik ऐप के पंचांग पेज पर देखा जा सकता है।
हर देवी की संक्षिप्त कथा:
- शैलपुत्री: पूर्वजन्म में सती, यज्ञ-अग्नि में देह त्यागकर अगले जन्म में हिमालय की पुत्री के रूप में जन्मीं। इसलिए नाम "शैल (पर्वत) की पुत्री"।
- ब्रह्मचारिणी: शिव को पति रूप में पाने के लिए हज़ारों वर्ष कठोर तप किया; यहीं से "संयम का फल मिलता है" की सीख।
- चंद्रघंटा: शिव-विवाह के समय पार्वती का वह रूप जिसमें मस्तक पर घंटे के आकार का अर्धचंद्र है, जिसे देखकर भय दूर होता है।
- कूष्मांडा: मान्यता है कि जब अंधकार था, तब इनकी मंद मुस्कान से ब्रह्मांड प्रकट हुआ।
- स्कंदमाता: स्कंद (कार्तिकेय) को गोद में लिए सिंह पर विराजमान; माता-पुत्र के निःस्वार्थ स्नेह का रूप।
- कात्यायनी: ऋषि कात्यायन की पुत्री के रूप में प्रकट; महिषासुर-मर्दन से जुड़ा रूप। कन्याएँ मनचाहे वर की कामना से पूजती हैं (लोक-परंपरा)।
- कालरात्रि: अंधकार जैसा रूप, पर भक्तों को निर्भय करने वाला। इन्हें "शुभंकरी" भी कहा जाता है।
- महागौरी: कठोर तप से सांवली पड़ी देह गंगाजल से पुनः गौर हुई, ऐसा लोकवर्णन है।
- सिद्धिदात्री: अष्ट सिद्धियाँ देने वाली; शिव ने भी इनकी कृपा से सिद्धियाँ पाईं, ऐसी कथा मिलती है।
(कथाएँ पुराणों और लोक-परंपरा में थोड़े भिन्न रूपों में मिलती हैं; यहाँ प्रचलित रूप संक्षेप में दिया गया है।)
संक्षेप में हर देवी:
- शैलपुत्री: हिमालय की पुत्री; नींव और स्थिरता की देवी। पहले दिन घी का भोग चढ़ाने की परंपरा है।
- ब्रह्मचारिणी: तप की प्रतीक। विद्यार्थी और साधक इन्हें विशेष मानते हैं।
- चंद्रघंटा: मस्तक पर अर्धचंद्र; भय और घबराहट के क्षणों में स्मरण की जाती हैं।
- कूष्मांडा: सृष्टि की आदि-ऊर्जा; इनकी उपासना आरोग्य और जीवन-शक्ति के भाव से होती है।
- स्कंदमाता: कार्तिकेय की माता; संतान और परिवार के कल्याण के लिए।
- कात्यायनी: विवाह-संबंधी कामनाओं में पारंपरिक रूप से पूजी जाती हैं।
- कालरात्रि: भयंकर दिखने वाला पर शुभ फल देने वाला रूप ("शुभंकरी")।
- महागौरी: पवित्रता और शांति। अष्टमी पर कन्या पूजन की परंपरा इसी से जुड़ी है।
- सिद्धिदात्री: साधना की पूर्णता; नवमी पर हवन और पूर्णाहुति।
कलश स्थापना विधि (सरल और व्यावहारिक)
सामग्री: मिट्टी का चौड़ा पात्र, साफ़ मिट्टी, जौ, तांबे/मिट्टी का कलश, गंगाजल या स्वच्छ जल, सुपारी, सिक्का, अक्षत, आम के पत्ते, जटा वाला नारियल, लाल चुनरी/कलावा, रोली, दीपक, फूल।
क्रम:
- पूजा-स्थान की सफ़ाई करें, पूर्व या उत्तर-पूर्व की ओर मुख रखकर बैठें।
- मिट्टी के पात्र में परत-दर-परत मिट्टी और जौ बिछाएँ।
- कलश पर कलावा बाँधें, जल भरें, उसमें सुपारी, सिक्का और अक्षत डालें।
- मुख पर आम के पाँच पत्ते रखें, उन पर चुनरी लिपटा नारियल रखें।
- दीपक जलाएँ, गणेश स्मरण से आरंभ करें, फिर देवी का आवाहन करें।
- संकल्प लें (कितने दिन का व्रत, कौन-सा अनुष्ठान)।
- नौ दिन सुबह-शाम दीप जलाएँ, जौ में थोड़ा जल डालें।
नवमी का हवन और पूर्णाहुति (सरल विधि): नवमी को स्नान के बाद छोटा हवन-कुंड या ताँबे का पात्र रखें; आम की समिधा, काले तिल, जौ, घी और कपूर लें। गणेश, फिर देवी के नाम से आहुति दें ("ॐ दुर्गायै नमः स्वाहा" जैसा सरल मंत्र पर्याप्त है), अंत में नारियल और पूर्णाहुति। फ्लैट में धुएँ की समस्या हो तो घी का दीपक और आरती से भी पूर्णाहुति का भाव निभ जाता है। हवन नवमी तिथि में (19 अक्टूबर सुबह 10:52 के बाद से 20 अक्टूबर दोपहर 12:50 से पहले) करें; दशमी लगने के बाद पारण/विसर्जन।
ज़रूरी बात: सभी मंत्र और पाठ को लेकर घबराएँ नहीं। यदि संस्कृत मंत्र न आते हों, तो "ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे" या सरल हिंदी में दुर्गा-आरती और प्रार्थना भी स्वीकार्य है। परंपराएँ पहले भाव और नियमितता माँगती हैं।
भोग और नैवेद्य
परंपरा में हर दिन के लिए अलग भोग प्रचलित है, जैसे पहले दिन गाय का घी, दूसरे दिन शक्कर/मिश्री, तीसरे दिन खीर या दूध की मिठाई, चौथे दिन मालपुआ, पाँचवें दिन केला, छठे दिन शहद, सातवें दिन गुड़, आठवें दिन नारियल, नौवें दिन तिल/अनाज के व्यंजन। (यह लोक-परंपरा का प्रचलित क्रम है और क्षेत्र के अनुसार बदलता है।)
प्रथम दिन 11 अक्टूबर रविवार है, इसलिए खीर का भोग स्वाभाविक है; साथ में घी का दीपक। कुछ ग्रंथ-परंपराओं में तिथि, वार, नक्षत्र और योग के आधार पर विशेष नैवेद्य (घी, पायस, मधु, वटक, सूरण आदि) का वर्णन बताया जाता है। हम यहाँ उसकी सूची नहीं दे रहे, क्योंकि उसका सटीक पाठ-संदर्भ हम प्रमाणित नहीं कर पाए। जो घर पारिवारिक पुस्तक से यह विधि जानते हैं, वे उसे मानें।
ज्योतिषीय दृष्टि: इस नवरात्रि में क्या देखें
- वार और देवी का वाहन: रविवार से आरंभ होने पर नवरात्र का आरंभ सूर्य के वार से होता है, जो आत्मबल, पिता और अधिकार का कारक है। पंचांगों में प्रचलित नियम यह है कि रवि/सोमवार को देवी का आगमन गज (हाथी) पर माना जाता है, जिसे लोक-परंपरा में अच्छी वर्षा और समृद्धि का संकेत कहा जाता है। प्रस्थान दशमी के वार से देखा जाता है; इस बार दशमी मंगलवार को है, जिसके लिए प्रचलित नियम में "कुक्कुट" वाहन का नाम आता है और उसे अशांति/कष्ट का सूचक माना जाता है। ये परंपरागत मान्यताएँ हैं, भविष्यवाणी नहीं; इनसे घबराएँ नहीं, बल्कि इसे सावधानी, सेवा और संयम का संकेत भर मानें।
- चित्रा नक्षत्र: मंगल के स्वामित्व का नक्षत्र (कन्या-तुला का विस्तार)। इसीलिए इस दिन उत्साह और ऊर्जा के साथ अधीरता भी हो सकती है। देवी साधना से इसे संयमित करना उपयुक्त है। नवरात्र के नौ दिन चंद्र-नक्षत्र (हमारी गणना, सूर्योदय पर): 11 चित्रा · 12 स्वाति · 13 विशाखा · 14 अनुराधा · 15–16 ज्येष्ठा · 17 मूल · 18 पूर्वाषाढ़ा · 19 उत्तराषाढ़ा · 20 श्रवण (विजयादशमी)। श्रवण नक्षत्र में विजयादशमी का होना पारंपरिक रूप से शुभ गिना जाता है।
- शुक्र की भूमिका: आश्विन में सूर्य कन्या से तुला की ओर बढ़ते हैं और तुला का स्वामी शुक्र है, जो स्त्री-शक्ति, सौंदर्य और भोग-संतुलन का कारक है। इसलिए शारदीय नवरात्र का देवी-भाव ज्योतिषीय रूप से भी सहज बैठता है।
- अपनी कुंडली से जोड़ें: नवरात्र में सबसे प्रभावी जपोपासना उस ग्रह के लिए मानी जाती है जो आपकी कुंडली में पीड़ित हो। अपनी जन्म कुंडली में महादशा-अंतर्दशा देखकर तय करें।
राशि अनुसार सरल उपाय
(ये श्रद्धा-आधारित परंपरागत सुझाव हैं, इन्हें कोई चमत्कारिक या निश्चित परिणाम का दावा न मानें।)
| राशि | सुझाव |
|---|---|
| मेष | दुर्गा चालीसा; लाल पुष्प अर्पण |
| वृषभ | श्वेत पुष्प, खीर का भोग; महागौरी का ध्यान |
| मिथुन | हरी वस्तुएँ दान, विद्यार्थियों की सहायता |
| कर्क | दूध/चावल का दान; माँ का सम्मान |
| सिंह | सूर्य को जल; पिता/गुरु का आशीर्वाद |
| कन्या | कन्या पूजन में सहयोग; स्वच्छता और अनुशासन |
| तुला | शुक्रवार को श्वेत वस्त्र/मिठाई का दान |
| वृश्चिक | क्रोध पर नियंत्रण; लाल वस्तुओं का दान |
| धनु | गुरुजनों की सेवा; पीले फल का दान |
| मकर | ज़रूरतमंद को भोजन; सेवा |
| कुंभ | दीप-दान; एकांत में जप |
| मीन | जल-सेवा, पीपल-तुलसी की देखभाल |
इन्हें अपनी महादशा और कुंडली के अनुसार अनुकूलित करना बेहतर रहता है।
लाल किताब और अंक-ज्योतिष के सरल सुझाव
- लाल किताब परंपरा: नवरात्र में जौ के अंकुर, कलश का जल, और दान को शुभ माना जाता है। इन्हें सेवा-भाव से करें, डर से नहीं।
- अंक-ज्योतिष: 9 अंक मंगल का है, और नवरात्र के 9 दिन मंगल-शक्ति से जुड़े माने जाते हैं। जिनका मूलांक 9 है, वे इन दिनों में संयम और दान पर ध्यान दें। यह जुड़ाव सांकेतिक है, शास्त्रीय प्रमाण नहीं।
व्रत, आहार और स्वास्थ्य
व्रत का मतलब भूखा रहना नहीं है।
- क्या खाएँ: कुट्टू/सिंघाड़ा/राजगिरा, साबूदाना (संतुलित मात्रा में), फल, दूध-दही, मखाना, मेवे, सेंधा नमक।
- क्या न करें: पूरे दिन निर्जल रहना, या तला-भुना बहुत ज़्यादा खाना।
- जिन्हें सावधानी चाहिए: मधुमेह, उच्च रक्तचाप, गर्भावस्था, बुज़ुर्ग और बच्चे। इनके लिए डॉक्टर की सलाह से ही व्रत करें। देवी के लिए स्वास्थ्य से बड़ा कोई अनुष्ठान नहीं।
- नियमित दवाइयाँ व्रत के कारण न छोड़ें।
आधुनिक दृष्टिकोण
मनोविज्ञान की दृष्टि से नौ दिन का नियम एक रूटीन देता है: जल्दी उठना, स्नान, दीप, जप, हल्का भोजन। यह तनाव कम करने और आदत बनाने में मदद करता है। जौ उगाना देखभाल और धैर्य सिखाता है। सामूहिक पूजा-गरबा सामाजिक जुड़ाव बढ़ाते हैं। आप मानें या न मानें, इन नौ दिनों को ख़ुद को सँवारने का अवसर बना
या जा सकता है।
सामान्य गलतियाँ
- किसी एक वेबसाइट का समय देखकर, बिना अपने शहर का पंचांग मिलाए, स्थापना कर लेना।
- चित्रा-वैधृति का नियम पढ़े बिना पूरे दिन में कभी भी स्थापना।
- व्रत के नाम पर पूरे दिन भूखे रहना और शाम को ज़रूरत से ज़्यादा खा लेना।
- जौ को पानी न देना या ज़्यादा भर देना।
- पूजा की सामग्री पर खर्च बढ़ाना; देवी को दिखावा नहीं, भाव चाहिए।
- डर-आधारित उपाय ("ये न किया तो अनर्थ होगा") मान लेना। प्रामाणिक परंपरा भय पर नहीं, श्रद्धा पर चलती है।
आवश्यक सावधानियाँ
- दीपक और अगरबत्ती के पास बच्चों और ज्वलनशील वस्तुओं का ध्यान रखें।
- कलश का जल नौ दिन में बदला जा सकता है; अंत में उसे पौधों में डालें।
- जौ और पूजन-सामग्री का विसर्जन नदी में प्लास्टिक के साथ न करें; पर्यावरण का ध्यान रखें।
- दान अपनी सामर्थ्य से करें, कर्ज़ लेकर नहीं।
FAQ
शारदीय नवरात्रि 2026 कब से शुरू है? 11 अक्टूबर 2026, रविवार से, और विजयादशमी 20 अक्टूबर 2026 को है।
कलश स्थापना का सही समय क्या है? 11 अक्टूबर को प्रतिपदा रात 9:31 तक है, पर चित्रा नक्षत्र और वैधृति योग के कारण अभिजित मुहूर्त सुरक्षित माना जाता है: दिल्ली में 11:44–12:30, देहरादून में 11:41–12:27। कुछ पंचांग सुबह का समय भी देते हैं; कुल-परंपरा और पुरोहित का निर्देश सर्वोपरि है।
चित्रा नक्षत्र और वैधृति योग में स्थापना क्यों वर्जित मानी जाती है? ग्रंथों में इन्हें घटस्थापना के लिए निषिद्ध कहा गया है। जब ये प्रतिपदा में पूरे दिन रहें, तो पंचांगकार अभिजित जैसे अपवाद-काल को स्वीकार करते हैं।
अष्टमी और नवमी इस बार कब है? अष्टमी 18 अक्टूबर सुबह 8:28 से 19 अक्टूबर सुबह 10:52 तक है, और नवमी 19 अक्टूबर सुबह 10:52 से 20 अक्टूबर दोपहर 12:50 तक (दिल्ली)। इसलिए अधिकांश पंचांग दोनों 19 अक्टूबर को बताते हैं, जबकि बंगाल-पद्धति में अष्टमी 18 को मानी जाती है।
क्या बिना पंडित के कलश स्थापना कर सकते हैं? हाँ, गृहस्थ सादी विधि से स्वयं कर सकते हैं, यदि श्रद्धा और स्वच्छता हो।
क्या नवरात्र में बाल-नाखून काटना मना है? यह लोक-मान्यता है, शास्त्रीय बाध्यता नहीं। परिवार की परंपरा के अनुसार चलें।
व्रत में चाय-कॉफ़ी चलेगी? सामान्यतः अधिकांश घरों में दूध की चाय चलती है। व्रत का नियम अपने परिवार की परंपरा के अनुसार रखें।
कन्या पूजन कब करें? अष्टमी या नवमी को, अपनी परंपरा के अनुसार।
निष्कर्ष
शारदीय नवरात्रि 2026 में तारीख साफ़ है (11 अक्टूबर), पर घटस्थापना का समय पंचांग के अनुसार बदलता है। इसलिए सही रास्ता है: अपने शहर का पंचांग देखें, चित्रा-वैधृति का नियम समझें, परिवार की परंपरा मानें, और अभिजित को सुरक्षित विकल्प रखें। बाकी नौ दिन संयम, सेवा और साधना के हैं।
अपनी कुंडली के अनुसार नवरात्र में किस ग्रह पर काम करना है, यह जानने के लिए Astroyantrik पर अपनी कुंडली देखें।
लेखक: Astroyantrik संपादकीय टीम · अंतिम अद्यतन: 10 अक्टूबर 2026 · पंचांग-समय स्थानीय पंचांग से मिलाकर ही प्रयोग करें।