दिवाली से दो-तीन दिन पहले हर घर में एक ही सवाल चलता है: "पूजा किस समय करें, कहीं मुहूर्त निकल तो नहीं जाएगा?" कोई शाम बताता है, कोई आधी रात। व्हाट्सऐप पर तीन अलग समय घूमते हैं, और पूजा से पहले ही मन में हल्की घबराहट बैठ जाती है।
इस लेख का काम उस घबराहट को दूर करना है। हम सीधे बताएँगे कि दिवाली 2026 में लक्ष्मी पूजा कब है, किस समय करना सबसे उत्तम है, विधि क्या है, और अगर आप मुहूर्त में न पहुँच पाएँ तो क्या करें।
त्वरित उत्तर
- दिवाली और लक्ष्मी पूजा: रविवार, 8 नवंबर 2026
- पूजा का मुख्य मुहूर्त (नई दिल्ली): शाम 5:54 से 7:50 बजे (प्रदोष काल में वृषभ लग्न)
- प्रदोष काल (नई दिल्ली): शाम 5:31 से रात 8:09 बजे
- महानिशीथ काल: रात 11:39 से 12:31 बजे (मुख्यतः साधकों के लिए)
- अमावस्या तिथि: 8 नवंबर को सुबह 11:27 बजे से 9 नवंबर को दोपहर 12:31 बजे तक
ये समय नई दिल्ली के हैं। आपके शहर में कुछ मिनट से लेकर आधे घंटे तक का अंतर हो सकता है। 12 शहरों का समय आगे तालिका में दिया है।
दिवाली 8 नवंबर को है या 9 को?
दीपावली कार्तिक मास की अमावस्या को मनाई जाती है। इस बार अमावस्या 8 नवंबर की सुबह शुरू होकर 9 नवंबर की दोपहर तक रहती है, इसलिए भ्रम होना स्वाभाविक है।
नियम सीधा है। लक्ष्मी पूजा प्रदोष काल में होती है। जिस दिन सूर्यास्त के बाद के प्रदोष काल में अमावस्या मौजूद हो, उसी दिन पूजा मान्य है। 8 नवंबर की शाम को अमावस्या पूरी तरह मौजूद है, जबकि 9 नवंबर को सूर्यास्त के समय तक यह समाप्त हो चुकी होगी। इसलिए लक्ष्मी पूजा 8 नवंबर, रविवार को ही होगी। हमने जो प्रमुख पंचांग और समाचार स्रोत देखे, वे सब इसी पर एकमत हैं।
लक्ष्मी पूजा का शुभ मुहूर्त

| क्या | समय (नई दिल्ली) | किसके लिए |
|---|---|---|
| प्रदोष काल | शाम 5:31 से रात 8:09 | गृहस्थों की पूजा इसी के भीतर |
| मुख्य मुहूर्त (वृषभ लग्न) | शाम 5:54 से 7:50 | सबसे उत्तम; लगभग 1 घंटा 56 मिनट |
| महानिशीथ काल | रात 11:39 से 12:31 | तांत्रिक/साधक और अनुभवी पंडित |
| चोपड़ा पूजन | प्रदोष काल में | व्यापारी, बही-खाता पूजन |
वृषभ लग्न को सबसे अच्छा क्यों माना जाता है?
वृषभ स्थिर राशि है और उसका स्वामी शुक्र है, जो सुख, संपदा और वैभव का कारक माना गया है। परंपरा कहती है कि स्थिर लग्न में की गई पूजा घर में टिकी रहती है। इसी कारण प्रदोष काल के भीतर वृषभ लग्न को चुनने का नियम है।
चौघड़िया देखें या नहीं?
कई लेखों में लक्ष्मी पूजा के लिए चौघड़िया के समय भी दिए जाते हैं। इसकी सलाह नहीं देता, क्योंकि चौघड़िया मुख्यतः यात्रा के लिए देखे जाते हैं। लक्ष्मी पूजा में प्रदोष और स्थिर लग्न को प्राथमिकता दें।
अपने शहर का मुहूर्त (लक्ष्मी पूजा, लगभग)
| शहर | समय |
|---|---|
| नई दिल्ली | 5:54–7:50 |
| नोएडा | 5:54–7:49 |
| गुरुग्राम | 5:55–7:51 |
| चंडीगढ़ | 5:52–7:46 |
| जयपुर | 6:03–7:59 |
| कोलकाता | 5:20–7:18 |
| अहमदाबाद | 6:22–8:20 |
| मुंबई | 6:27–8:27 |
| पुणे | 6:24–8:24 |
| हैदराबाद | 6:07–8:08 |
| चेन्नई | 6:07–8:09 |
| बेंगलुरु | 6:17–8:20 |
यह तालिका के शहर-वार समय पर आधारित है। जो शहर यहाँ नहीं है, उसके लिए पंचांग में अपना शहर चुनें। एक नियम याद रखें: अपने शहर के सूर्यास्त के बाद का पहला स्थिर लग्न चुनें।
अलग-अलग वेबसाइट पर समय अलग क्यों मिलता है?
तीन कारण हैं। शहर बदलने से सूर्यास्त और लग्न का समय बदलता है। गणना की पद्धति अलग हो सकती है, इसलिए कुछ पंचांग 6:27 से 8:27 जैसा समय देते हैं, जो मुंबई के आसपास का है। और कई लेख यह लिखते ही नहीं कि समय किस शहर का है। एक स्रोत में अमावस्या के अंत का समय 9 नवंबर की "रात" 12:31 लिखा दिखा, जबकि मानक पंचांग में यह दोपहर 12:31 है। इसलिए हमेशा शहर का नाम और समय का स्रोत देखें।
लोग दिवाली पर असल में क्या पूछते हैं?
- दिवाली 8 को है या 9 को?
- पूजा सचमुच किस समय करें, और अलग-अलग समय क्यों दिखते हैं?
- नौकरी से लौटकर शाम 7:30 या 8 बजे तक घर पहुँचें तो क्या पूजा हो सकेगी?
- पूजा की विधि क्या है, पहले गणेश या लक्ष्मी?
- दुकान या दफ़्तर की पूजा कैसे और कब करें?
- कुछ ग़लत हो गया तो क्या अशुभ होगा?
आगे इन सबका जवाब है।
दिवाली और लक्ष्मी पूजन का महत्व
दिवाली एक पर्व है, पर उसकी कई परतें हैं।
- श्रीराम की अयोध्या वापसी। परंपरा के अनुसार चौदह वर्ष के वनवास के बाद श्रीराम कार्तिक अमावस्या को अयोध्या लौटे और नगरवासियों ने दीप जलाकर उनका स्वागत किया।
- समुद्र मंथन और लक्ष्मी। पौराणिक परंपरा में देवी लक्ष्मी का समुद्र मंथन से प्रकट होना बताया गया है। लक्ष्मी के स्वागत और पूजन की मान्यता इसी से जुड़ी है।
- बलि और वामन की कथा। कुछ क्षेत्रों में दिवाली को राजा बलि और वामन अवतार की कथा से जोड़ा जाता है।
- जैन परंपरा। भगवान महावीर के निर्वाण की स्मृति।
- सिख परंपरा। बंदी छोड़ दिवस, गुरु हरगोबिंद साहिब की मुक्ति का दिन।
- पूर्वी भारत। बंगाल, ओडिशा और असम के बड़े हिस्से में इसी रात काली पूजा (श्यामा पूजा) होती है, जो निशीथ काल की साधना से जुड़ी है।
एक ही पर्व के अलग-अलग क्षेत्रों में अलग भाव हैं। इसे विरोध नहीं, भारतीय परंपरा की विविधता समझें।
गणेश जी पहले क्यों? लक्ष्मी धन और सौभाग्य हैं। गणेश बुद्धि और विघ्नहर्ता हैं। भाव यह है कि धन के साथ विवेक पहले आए। इसीलिए पूजा का क्रम गणेश से शुरू होता है।
शास्त्रीय और पौराणिक संदर्भ
- श्रीसूक्त। देवी लक्ष्मी की प्राचीन स्तुति, जिसकी परंपरा ऋग्वेद के खिल-भाग से जुड़ी बताई जाती है। उसकी शुरुआत "हिरण्यवर्णां हरिणीं सुवर्णरजतस्रजाम्" से होती है। दिवाली पूजन में इसका पाठ बहुत प्रचलित है।
- पुराण परंपरा। पद्म पुराण और स्कंद पुराण जैसी परंपरा में कार्तिक मास में दीपदान और लक्ष्मी-पूजन की महिमा बताई गई है।
- कनकधारा स्तोत्र। आदि शंकराचार्य की रचना मानी जाती है। कथा के अनुसार एक निर्धन ब्राह्मणी के घर सोने के आँवलों की वर्षा हुई थी। संदेश यह है कि लक्ष्मी की कृपा के साथ करुणा और भाव का भी संबंध है।
- तिथि-निर्णय का नियम। लक्ष्मी पूजा के लिए प्रदोष-व्यापिनी अमावस्या को ग्रहण करने का नियम धर्मशास्त्र के निबंध-ग्रंथों की परंपरा में मिलता है।
ये संदर्भ परंपरा के सामान्य रूप में दिए हैं। किसी श्लोक की संख्या या अध्याय हमने नहीं दिया है।
ज्योतिषीय दृष्टि
कार्तिक अमावस्या पर सूर्य और चंद्रमा दोनों तुला राशि में होते हैं। तुला शुक्र की राशि है, और शुक्र धन, सुख और सौंदर्य का कारक है। इसी कारण इस अमावस्या का संबंध वैभव-साधना से जोड़ा जाता है।
व्यक्तिगत स्तर पर आपकी कुंडली में दूसरे भाव (संचित धन), ग्यारहवें भाव (लाभ) और शुक्र व गुरु की स्थिति देखी जाती है। इसलिए किसी के लिए लक्ष्मी साधना ज़्यादा अनुकूल होगी और किसी को अन्य उपाय की ज़रूरत पड़ सकती है। एक ही सलाह सब पर लागू नहीं होती।
ये ज्योतिषीय संबंध आस्था और परंपरा पर आधारित हैं। इनके आधार पर आर्थिक लाभ की गारंटी नहीं दी जा सकती।
पूजा की तैयारी

सफ़ाई। दिवाली से पहले घर की सफ़ाई एक तरह का मानसिक नवीनीकरण भी है। पूजा-स्थान उत्तर-पूर्व (ईशान) या पूर्व दिशा में रखना शुभ माना जाता है।
द्वार। रंगोली, आम या अशोक के पत्तों का तोरण और शाम को दीपक। कई घरों में मुख्य द्वार पर एक यम का दीपक भी जलाया जाता है।
पूजा सामग्री
- प्रतिमा: लक्ष्मी-गणेश (मिट्टी की शुभ मानी जाती है), कुबेर या सरस्वती का चित्र वैकल्पिक
- पूजन: चौकी, लाल या पीला कपड़ा, कलश, आम के पत्ते, नारियल, अक्षत, रोली, कुमकुम, हल्दी, मौली, जनेऊ, दूर्वा
- अर्पण: कमल या गेंदे का फूल, माला, पान, सुपारी, लौंग, इलायची, बताशे, खील, मिठाई, फल, कमलगट्टा
- दीप: मिट्टी के दीये (कम से कम 11 या 21), घी या तेल, बाती, एक बड़ा चौमुखा दीया
- शुद्धि: गंगाजल, कपूर, धूप, अगरबत्ती
- धन-प्रतीक: चाँदी या ताँबे के सिक्के, बही-खाता, गोमती चक्र, कौड़ी
लक्ष्मी-गणेश पूजन की विधि

- स्नान और संकल्प। स्नान के बाद स्वच्छ वस्त्र पहनें। हाथ में जल, अक्षत और फूल लेकर संकल्प करें कि परिवार की सुख-समृद्धि के लिए आप लक्ष्मी-गणेश का पूजन कर रहे हैं।
- स्थान की शुद्धि। गंगाजल छिड़कें, चौकी पर लाल या पीला कपड़ा बिछाएँ।
- स्थापना। सामान्य परंपरा में गणेश जी लक्ष्मी जी के बाईं ओर रखे जाते हैं। पास में जल भरा कलश रखें, उस पर आम के पत्ते और नारियल रखें।
- दीप-प्रज्वलन और आचमन। घी का दीप जलाएँ और आचमन करें।
- गणेश पूजन। रोली, अक्षत, दूर्वा और फूल से सबसे पहले गणेश जी की पूजा करें।
- कलश पूजन। कलश में जल, सुपारी, सिक्का और अक्षत डालें।
- लक्ष्मी पूजन। देवी को जल या पंचामृत से स्नान कराएँ, फिर वस्त्र, कमल का फूल, कुमकुम, इत्र, खील-बताशे, मिठाई और दक्षिणा अर्पित करें।
- कुबेर और बही-खाता। तिजोरी, बही-खाते और सिक्कों पर स्वस्तिक बनाकर तिलक करें।
- श्रीसूक्त या मंत्र-जप। शांत मन से पाठ करें।
- आरती और प्रसाद। आरती करें, क्षमा-प्रार्थना करें और प्रसाद बाँटें।
- दीपदान। पूजा के बाद घर के हर कोने, आँगन, तुलसी, छत और मुख्य द्वार पर दीपक रखें।
विस्तृत पूजा में लगभग 45 से 60 मिनट लगते हैं। समय कम हो तो 20 से 25 मिनट की संक्षिप्त पूजा भी स्वीकार्य है।
मंत्र
- लक्ष्मी: ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये प्रसीद प्रसीद ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं महालक्ष्म्यै नमः। (सरल रूप: ॐ महालक्ष्म्यै नमः)
- गणेश: ॐ गं गणपतये नमः।
- कुबेर: ॐ यक्षाय कुबेराय वैश्रवणाय धनधान्याधिपतये धनधान्यसमृद्धिं मे देहि दापय स्वाहा।
108 बार जप आदर्श माना जाता है। व्यस्तता हो तो 11 या 21 बार श्रद्धा से करना भी पर्याप्त है।
मुहूर्त में न पहुँच पाएँ तो क्या करें?
यह सबसे आम समस्या है, इसलिए स्पष्ट बात:
- पूजा का आरंभ प्रदोष काल में कर लें। दिल्ली में प्रदोष रात 8:09 तक है। मुख्य वृषभ लग्न 7:50 तक है, पर पहले संकल्प लेकर पूजा शुरू कर देना ही परंपरा में पर्याप्त माना जाता है।
- तैयारी पहले करें। घर लौटने से पहले किसी परिजन से सामग्री सजवा लें। कलश, दीये और मिठाई तैयार रहें।
- संक्षिप्त विधि अपनाएँ। गणेश-लक्ष्मी का स्मरण, दीप, एक मंत्र और आरती भी भावपूर्वक की गई पूजा है।
- फिर भी चूक जाएँ तो उसी रात महानिशीथ काल या अगले दिन सुबह शांत मन से संक्षिप्त पूजा कर लें। पर इसे नियम न बनाएँ; मुख्य पूजा प्रदोष में ही श्रेष्ठ है।
व्यापारियों के लिए चोपड़ा पूजन
गुजरात और कई व्यापारिक समुदायों में दिवाली नए वित्तीय वर्ष की शुरुआत मानी जाती है। इस दिन नए बही-खाते या खाता-किताब का पूजन होता है। इसे प्रदोष काल में, या अपने समुदाय की परंपरा और स्थानीय पंचांग के अनुसार, करें। बही के पहले पन्ने पर स्वस्तिक बनाएँ और "श्री गणेशाय नमः" तथा "शुभ लाभ" लिखा जाता है।
इस बहाने साल भर के खातों का हिसाब देखना, बजट बनाना और कर्ज़ों की योजना बनाना भी आधुनिक अर्थों में अच्छी शुरुआत है।
महानिशीथ काल: क्या सबको इसकी ज़रूरत है?
नहीं। महानिशीथ काल (दिल्ली में रात 11:39 से 12:31 बजे) मुख्यतः साधना करने वालों, मंत्र-जप करने वालों और काली या तंत्र उपासकों के लिए माना जाता है। सामान्य गृहस्थों को इसकी चिंता किए बिना प्रदोष काल में पूजा कर लेनी चाहिए। बंगाल में इसी रात काली पूजा की परंपरा है।
वास्तु, लाल किताब और अंक ज्योतिष
वास्तु। पूजा-स्थान ईशान कोण में रखें। तिजोरी उत्तर दिशा (कुबेर की दिशा) की ओर खुलने वाली रखने की परंपरा है। मुख्य द्वार स्वच्छ और रोशन रखें, और उसके आसपास कचरा या टूटा सामान न रखें।
लाल किताब परंपरा। इसमें अमावस्या पर दीपक जलाने और ज़रूरतमंद को दान देने जैसे लोक-उपाय बताए जाते हैं। इन्हें श्रद्धा और सेवा की दृष्टि से लें।
अंक ज्योतिष। 8 तारीख़ का मूलांक 8 है, जिसका स्वामी परंपरा में शनि माना जाता है। शनि अनुशासन और कर्मफल से जुड़ा है। यानी धन के लिए परिश्रम और अनुशासन भी चाहिए। यह प्रतीकात्मक व्याख्या है।
आज के समय में दिवाली

- मनोविज्ञान। साल में एक बार घर की सफ़ाई, सजावट और पूरे परिवार का साथ बैठकर पूजा करना तनाव घटाता है और जुड़ाव बढ़ाता है।
- वित्तीय दृष्टि। इस दिन बजट, बचत और निवेश की योजना बनाना आधुनिक "लक्ष्मी पूजा" है। सोना या निवेश सामान्य जानकारी से आगे बढ़ें तो योग्य सलाहकार से पूछें।
- पर्यावरण। पटाखों से वायु-प्रदूषण दमा के रोगियों, बुज़ुर्गों और बच्चों को सबसे ज़्यादा नुकसान पहुँचाता है। दीप, मिट्टी के दीये और स्थानीय कारीगरों से ख़रीदारी परंपरा की भावना के ज़्यादा क़रीब है।
- सामाजिक पक्ष। दीपदान, मिठाई बाँटना और ज़रूरतमंद की मदद, ये लक्ष्मी की कृपा का सबसे व्यावहारिक रूप हैं।
कुछ आम स्थितियाँ (काल्पनिक, पर बहुत सामान्य)
देर से घर पहुँचने वाला परिवार। शाम 7:45 बजे घर पहुँचा एक दंपति पहले दस मिनट में कलश और दीये सजाता है, फिर प्रदोष काल समाप्त होने (दिल्ली में 8:09) से पहले संकल्प लेकर संक्षिप्त पूजा आरंभ कर देता है।
दुकानदार। एक कपड़ा व्यापारी शाम को दुकान में बही-खाते का पूजन करता है और परिवार घर पर अलग पूजा कर लेता है। दोनों जगह पूजा मान्य है।
अकेले रहने वाले। हॉस्टल या किराए के कमरे में बड़ी मूर्ति ज़रूरी नहीं। एक छोटी तस्वीर, एक दीया और "ॐ महालक्ष्म्यै नमः" का जप भी पूर्ण पूजा है।
सामान्य गलतियाँ
- 8 की जगह 9 नवंबर को पूजा करना।
- प्रदोष काल समाप्त होने के बाद पूजा शुरू करना।
- सामग्री पहले जुटाए बिना मुहूर्त में बाज़ार भागना।
- चौघड़िया के समय को लक्ष्मी पूजा का मुहूर्त मान लेना।
- अकेली लक्ष्मी की प्रतिमा रखना, गणेश को छोड़ देना।
- दिखावे के लिए महँगा सामान ख़रीदना।
- दीपक जलाकर खुला छोड़ देना।
- किसी भी वेबसाइट का समय बिना अपने शहर से मिलाए मान लेना।
विशेषज्ञ सुझाव और सावधानियाँ
- मुहूर्त से एक घंटा पहले सारी सामग्री पूजा-स्थान पर रख लें।
- पूजा के समय फ़ोन साइलेंट रखें और बच्चों को छोटी-छोटी ज़िम्मेदारियाँ दें।
- पूजा के बाद बचत और ख़र्च का एक संकल्प लिखें।
- किसी ज़रूरतमंद को भोजन, वस्त्र या मिठाई दें।
- दीपक के पास बच्चे, परदे और सिंथेटिक कपड़े सावधानी से रखें। पास में पानी तैयार रखें।
- पटाखे चलाएँ तो खुले स्थान पर और स्थानीय नियमों के अनुसार।
- डर दिखाकर महँगे "उपाय" बेचने वालों से बचें।
- बुज़ुर्ग, गर्भवती महिलाएँ और रोगी लंबे जागरण या देर रात की पूजा से बचें।
पाँच दिन का दीपोत्सव 2026

| दिन | तारीख़ | पर्व |
|---|---|---|
| पहला | 6 नवंबर, शुक्रवार | धनतेरस |
| दूसरा | 7 नवंबर, शनिवार | नरक चतुर्दशी / छोटी दिवाली |
| तीसरा | 8 नवंबर, रविवार | दिवाली और लक्ष्मी पूजा |
| चौथा | 10 नवंबर, मंगलवार | गोवर्धन पूजा |
| पाँचवाँ | 11 नवंबर, बुधवार | भाई दूज |
अंतिम दो पर्वों की तिथि कुछ पंचांगों में एक दिन आगे-पीछे मिलती है। स्थानीय पंचांग देख लें।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
1. दिवाली 2026 में लक्ष्मी पूजा कब है? रविवार, 8 नवंबर 2026 को, शाम के प्रदोष काल में।
2. लक्ष्मी पूजा का सबसे शुभ समय क्या है? नई दिल्ली के लिए शाम 5:54 से 7:50 बजे (प्रदोष काल में वृषभ लग्न)। अन्य शहरों के लिए ऊपर की तालिका देखें।
3. क्या दिवाली 9 नवंबर को भी मना सकते हैं? अमावस्या 9 नवंबर की दोपहर तक है, पर प्रदोष काल में अमावस्या 8 नवंबर को ही मिलती है। इसलिए मुख्य पूजा 8 नवंबर को है।
4. मुहूर्त में पूजा न कर पाएँ तो? प्रदोष काल के भीतर पूजा आरंभ कर लें। न हो सके तो उसी रात संक्षिप्त पूजा करें। श्रद्धा से की गई पूजा को महत्व दिया गया है।
5. क्या लक्ष्मी पूजा के लिए चौघड़िया देखना चाहिए? नहीं। प्रदोष काल और स्थिर लग्न (वृषभ) प्राथमिकता हैं। चौघड़िया मुख्यतः यात्रा आदि के लिए देखे जाते हैं।
6. महानिशीथ काल की पूजा किसके लिए है? मुख्यतः साधकों, मंत्र-जप करने वालों और काली उपासकों के लिए। सामान्य गृहस्थ प्रदोष में पूजा कर सकते हैं।
7. लक्ष्मी-गणेश की प्रतिमा किस दिशा में रखें? पूर्व या उत्तर-पूर्व में, गणेश जी लक्ष्मी जी की बाईं ओर।
8. दिवाली पर कितने दीये जलाएँ? 11 या 21 सामान्य हैं, कई घरों में 51 या 101 भी जलते हैं। संख्या से ज़्यादा स्वच्छता और भाव मायने रखता है।
9. व्यापारी चोपड़ा पूजन कब करें? प्रदोष काल में, या अपने समुदाय की परंपरा और स्थानीय पंचांग के अनुसार। बही के पहले पन्ने पर स्वस्तिक बनाकर "श्री गणेशाय नमः" और "शुभ लाभ" लिखें।
10. क्या लक्ष्मी पूजा से धन की गारंटी मिलती है? नहीं। यह आस्था और परंपरा है। आर्थिक उन्नति के लिए परिश्रम, बचत और सही निर्णय भी चाहिए।
निष्कर्ष
दिवाली 2026 में लक्ष्मी पूजा के लिए तारीख़ याद रखें: रविवार, 8 नवंबर। समय के लिए सूर्यास्त के बाद का प्रदोष काल चुनें, जिसमें नई दिल्ली के लिए शाम 5:54 से 7:50 बजे का वृषभ लग्न सबसे उत्तम है। अपने शहर का समय स्थानीय पंचांग से मिला लें, और देर हो जाए तो पूजा का आरंभ प्रदोष में कर दें।
पर लक्ष्मी केवल सोने-चाँदी की देवी नहीं हैं। वे स्वच्छता, परिश्रम, संतोष, रिश्तों और सद्बुद्धि की भी प्रतीक हैं। जिस घर में सफ़ाई, सामंजस्य और दान की भावना है, वहाँ दीया जलाना केवल रस्म नहीं रहता।
आपको और आपके परिवार को दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएँ।
अपनी कुंडली के अनुसार लक्ष्मी-उपाय जानने के लिए Astroyantrik के ज्योतिषाचार्य से परामर्श कर सकते हैं।